Thursday, September 25, 2008
gham
हमको हमारे ही ग़म ने मार दिया!
एक तरफ़ हसीं शाम,
दूसरी तरफ़ जाम,
और बीच में हम और हमारी ये बेदर्द बीमारी....
अब जी रहे हैं तो, सिर्फ़ उस लम्हे के इंतज़ार में,
जब इन होंटों की तन्हाई दूर हुए,
बस जाम फिर से हाथ में आ जाए!
और हमारे सारे दर्द हमें इस तन्हाई से छुडाए!
एक तरफ़ हसीं शाम,
दूसरी तरफ़ जाम,
और बीच में हम और हमारी ये बेदर्द बीमारी....
अब जी रहे हैं तो, सिर्फ़ उस लम्हे के इंतज़ार में,
जब इन होंटों की तन्हाई दूर हुए,
बस जाम फिर से हाथ में आ जाए!
और हमारे सारे दर्द हमें इस तन्हाई से छुडाए!
intezaar
उन्हें इंतज़ार था हमसे सुनने के लिए
बेचैनी थी हमारी शायरी के लिए मगर,
कमबख्त दिल का अपना अंदाज़ होता है
वोह कहता है...जब सामने आशिक है थो
यह जुबां कैसे चलायें?
चीर कर दिल की बातें कैसे सुनाएं?
जो यह खूबसूरत आँखें कहती हैं,
वोह शायद ही कोई कलम लिख पाए!
बेचैनी थी हमारी शायरी के लिए मगर,
कमबख्त दिल का अपना अंदाज़ होता है
वोह कहता है...जब सामने आशिक है थो
यह जुबां कैसे चलायें?
चीर कर दिल की बातें कैसे सुनाएं?
जो यह खूबसूरत आँखें कहती हैं,
वोह शायद ही कोई कलम लिख पाए!
jaam
कोई हमें जाम क्या पिलाएगा,
हम थो बिन पिए ही बहक गए हैं,
तुम्हारी आंखों से जो शरारत बहती है,
बस, वही हमें शराबी बना देती है.
हम थो बिन पिए ही बहक गए हैं,
तुम्हारी आंखों से जो शरारत बहती है,
बस, वही हमें शराबी बना देती है.
तीन अक्षर for bb
मैंने आख़िर खत लिख डाला
दिल की बात सुना डाला
हाँ, अपना वज़न कुछ कम कर डाला
दर्द-ऐ-दिल का बयां जो कर डाला
बस तीन ही लफ्जों में इतना कुछ कर डाला
उनके चेहरे की मुस्कराहट वापस ला डाला
सारे गिले शिक्वे मिटा डाला
हमारे तालुक़ात कायम कर डाला
बस तीन ही शब्द में ये सब कर डाला
मरते हैं हम एक बार
मगर कभी कभी जी लेतें हैं दो बार
एहसासों को दबाना मत
कह डाला जो जुबां पर है
आख़िर तीन ही थो लफ्जों का खेल हैं ये
गुज़रे हुए कल को भुला डालो!
भाई से माफ़ी मांग डालो!
लिखो "मुझे माफ़ करो"!

दिल की बात सुना डाला
हाँ, अपना वज़न कुछ कम कर डाला
दर्द-ऐ-दिल का बयां जो कर डाला
बस तीन ही लफ्जों में इतना कुछ कर डाला
उनके चेहरे की मुस्कराहट वापस ला डाला
सारे गिले शिक्वे मिटा डाला
हमारे तालुक़ात कायम कर डाला
बस तीन ही शब्द में ये सब कर डाला
मरते हैं हम एक बार
मगर कभी कभी जी लेतें हैं दो बार
एहसासों को दबाना मत
कह डाला जो जुबां पर है
आख़िर तीन ही थो लफ्जों का खेल हैं ये
गुज़रे हुए कल को भुला डालो!
भाई से माफ़ी मांग डालो!
लिखो "मुझे माफ़ करो"!
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