Thursday, September 25, 2008

gham

हमको हमारे ही ग़म ने मार दिया!
एक तरफ़ हसीं शाम,
दूसरी तरफ़ जाम,
और बीच में हम और हमारी ये बेदर्द बीमारी....
अब जी रहे हैं तो, सिर्फ़ उस लम्हे के इंतज़ार में,
जब इन होंटों की तन्हाई दूर हुए,
बस जाम फिर से हाथ में आ जाए!
और हमारे सारे दर्द हमें इस तन्हाई से छुडाए!

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